दिल्ली हाई कोर्ट ने 'लगातार' शिकायत करने वालों की पहचान सत्यापित करने के लिए एक खास डेटाबेस तैयार करने को अनिवार्य करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया है। चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने शोनी कपूर की याचिका खारिज कर दी, जिसमें हर पुलिस डिस्ट्रिक्ट हेडक्वॉर्टर को उन लोगों पर नजर रखने का आदेश देने की मांग की गई ची, जो रेप या यौन अपराधों की एक से ज्यादा शिकायतें दर्ज कराते हैं।
कोर्ट ने आदेश जारी करने से किया इनकार
दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यायिक आदेश जारी करने से इनकार करते हुए भी याचिकाकर्ता के विचारों को पूरी तरह से खारिज नहीं किया। बेंच ने कहा कि याचिका को एक सुझाव के तौर पर पेश किया गया था, जिसे कोर्ट कानूनी तौर पर लागू नहीं कर सकता फिर भी पुलिस अधिकारी अपने इंटरनल कामकाज के लिए इन प्रस्तावों पर विचार करने के लिए स्वतंत्र है।
आखिर क्या थी याचिकाकर्ता की मांग?
याचिकाकर्ता की मुख्य मांग पुलिस डिस्ट्रिक्ट लेबल पर एक अनिवार्य पहचान प्रणाली लागू करना थी। कपूर ने खासतौर पर यह तर्क दिया कि अधिकारियों को शिकायत करने वालों के आईडेंटिटी कार्ड के तौर पर आधार कार्ड जमा करने चाहिए, ताकि उन लोगों का एक पुख्ता डेटाबेस बनाया जा सके जिन्होंने कई आरोप लगाए हैं।
याचिका के पीछे क्या था उद्देश्य
याचिका का मकसद शहर भर में इन रिकॉर्ड को जिस 'खास तरीके से रखा जाता है, उसे एक जैसा बनाना था। हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रशासनिक और न्यायिक शक्तियों के बंटवारे पर एक सख्त रुख अपनाया। 8 अप्रैल के अपने आदेश में कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे डेटाबेस को बनाए रखने का तरीका पुलिस अधिकारियों का विशेषाधिकार और नजरिया है।
किन मामलों में लागू होता है 'रिट ऑफ मैडमस' अधिकार
बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि 'रिट ऑफ मैडमस' (एक न्यायिक आदेश जो किसी सरकारी अधिकारी को अपना कर्तव्य निभाने के लिए मजबूर करता है) केवल उन मामलों में लागू होता है, जहां संवैधानिक या कानूनी अधिकारों का साफ तौर पर उल्लंघन हुआ हो, या सार्वजनिक जिम्मेदारी निभाने में कोई चूक हुई हो। कोर्ट ने कहा, हमारी जानकारी में ऐसा कोई कानून नहीं आया है, जिसका उल्लंघन तब माना जा सके, जब शिकायत करने वाले से आधार कार्ड जमा न किया जा रहा हो।
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